
हीर सियाली कर्मां वाली
जिस रांझण ना पाया
इक उडारी ऐसी मारी
आल्हणा खेड़ियां दे घर पाया
बिण रांझण ना जीया जावे
जा मौत नूं गले लगाया
मैं वी हां इक हीर सलेटी
जिस जोगी वर पाया
इस जोगी मैनूं कीता कमली
सारी उम्र रुलाया
अक्खीयां थक्कीयां तक-तक बूहा
पर जोगी ना आया
नां जियोंदी हां, ना मोई हां
रब्बा इह की खेड रचाया
7 comments:
vha bhut sundar or bhut alag rachana. badhai ho. jari rhe.
बहुत वदिया!!
अक्खीयां थक्कीयां तक-तक बूहा
पर जोगी ना आया
नां जियोंदी हां, ना मोई हां
रब्बा इह की खेड रचाया
बहुत बढ़िया। बहुत समय बाद पंजाबी गीत पढ़ मजा आ गया।
घुघूती बासूती
पंजाबी में होने के बावजूद भी समझ पाया. :)
bahut badhiya.....punjabi geet ka alag maja hai.
nice to read in punjabi lil bit diffecult to undrstand but liked. N ya thanks for ur encouragement and appreciation on my poetry. Regards
प्हाई जितनी तारीफ़ करूं कम पड़ेगी !
इतनी सुंदर , कलेजे को चीर देने वाली
हीर कहूँ या क्या कहूँ ? मैंने नही पढी !
भाई थमनै प्रणाम ! बस जब भी लिखो
छुपाना मत ! शुभकामनाए !
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