Thursday, December 2, 2010

बाज़ार

क्यूं लिखूं कविता?
ताकि
उधेड़ दिया जाए
और कतरा-कतरा
बिखेर दिया जाए
शुष्क हवाओं में
और सूरज की
तपिश भस्म कर दे
उन विचारों को
उन संवेदनाओं को
जो मेरे जिस्म में
सिंचे हैं
क्यूं लिखूं कविता?
जबकि पता है
बिकाऊ होते जा रहे
अहसासों के बाज़ार में
बिकेगी लिफ़ाफ़ा-दर-लिफ़ाफ़ा
या
पड़ी होगी किसी कबाड़ी की दुकान पर
फिर से री-साइकिल होकर
बिकने के लिए
ताकि लिखी जाए
फिर नई कविता

22 comments:

डॉ .अनुराग said...

सचमुच इस समय में कविता शायद सिर्फ रुदन भर है ....

vijaymaudgill said...

sahi kaha aapne anuraag ji. vaise apka aana hi mere liye bahut kush hai.

रश्मि प्रभा... said...

इसलिए लिखो कविता
ताकि पढ़ सको तुम खुद को
कतरे कतरे में टूटते बहते मन को जोड़ सको
बाँध सको
जान सको कहाँ है क्षितिज ,कहाँ है भ्रम कहाँ है उड़ान
जी सको अपने उद्वेलित पलों को ...
ढूंढ़ सको एक व्योम अपने लिए
हाँ लिखो कविता सिर्फ अपने लिए ...

नीरज गोस्वामी said...

इस विलक्षण रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकारें...
नीरज

vijaymaudgill said...

rashmi ji apka shukriya par vo ek aveeg tha jise pane par likh dia
par likhna nahi shora abhi neeraj ji apka bhi bahut bahut aabhaar

chirag said...

kya bat hain bahut khoob likha hain
chk out my blog also
http://iamhereonlyforu.blogspot.com/

: केवल राम : said...

क्यूं लिखूं कविता?
जबकि पता है
बिकाऊ होते जा रहे
अहसासों के बाज़ार में
बिकेगी लिफ़ाफ़ा-दर-लिफ़ाफ़ा

सच में बहुत संजीदगी से अभिव्यक्त किया है आपने अपने भाव को ...पर कविता तो लिखनी ही पड़ेगी .....उसकी सार्थकता यही है ....शुक्रिया आपका

कविता रावत said...

क्यूं लिखूं कविता?
जबकि पता है
बिकाऊ होते जा रहे
अहसासों के बाज़ार में
बिकेगी लिफ़ाफ़ा-दर-लिफ़ाफ़ा
.....तमाम अंतर्द्वंधों के बीच सार्थक सोच के लिए कविता रचनी ही होगी.. ...
सिर्फ बिकने के लिए लिखा तो क्या लिखा!...... अच्छे के क़द्र कभी न कभी तो होगी... बस यही उम्मीद है...
बहुत सुन्दर रचना ....आभार

ZEAL said...

बिकेगी लिफ़ाफ़ा-दर-लिफ़ाफ़ा...
एक उम्दा अभिव्यक्ति।

Patali-The-Village said...

इस विलक्षण रचना के लिए बधाई|

vijaymaudgill said...

chiraag ji, kewal ram ji, kavita ji, Dr. Divya ji, aur patali the village ji aap sab dosto ka apne-2 sujhaav aur protsahit karne k liye bahut-2 aabhaar. baki aab to akhri saans tak sath chalegi kavitayain

saanjh said...

arey arey....kyun inna gussa sir, inna depression....aisa nahin hain, kavita ki qadr karne wale ham baithe hain na.... ;)

par jo bhi ho, aapka andaaz-e-bayaan bohot khoob hai, apne aakrosh ko khoobsurti se zahir kiya hai aapne...acchi kavita

हरकीरत ' हीर' said...

जबकि पता है
बिकाऊ होते जा रहे
अहसासों के बाज़ार में
बिकेगी लिफ़ाफ़ा-दर-लिफ़ाफ़ा
या
पड़ी होगी किसी कबाड़ी की दुकान पर

विजय जी अब हिंदी पर भी आपकी पकड़ बढती जा रही है ....
बहुत ही सशक्त कविता .....

neera said...

क्या लिखूँ कविता में से कितनी अच्छी कविता उभरी है..

ZEAL said...

विजय जी ,
आपके निवेदन पर अवसाद 'Depression' पर पोस्ट लगा दी है।

Amrita Tanmay said...

आह ! निस्संदेह उत्क्रिस्ट रचना ..मन के भीतर चला गया .. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....शुभकामनायें

रश्मि प्रभा... said...

apni yah kavita vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com per tasweer parichay blog link ke saath

vijaymaudgill said...

neera ji, amrita ji bahut bahut shukriya apka.

vijaymaudgill said...

harkeerat ji thnx. bas jo maan main aata hai likhe ja raha hu. aur usme koi changes nahi karta hu. kyuki mujhe aise lagta hai jo apke andar hai use vaisa hi bahar ane do.

ਸੰਦੀਪ ਸੀਤਲ ਚੌਹਾਨ said...

नमस्कार विजय जी,
आप का बहुत बहुत धन्यवाद मेरे ब्लॉग पर टिपण्णी देने के लिये. दरअसल "ਕਲਾਮ-ਏ-ਸੀਤਲ" में मेरे पिता की पूरानी रचनाये शामिल है । मेरी कवितायें "ਸ਼ਬਦ ਨੂਰ" में अंकित है http://sitalalankar.blogspot.com
आज पहली बार आपका ब्लाग देखा , बहुत अच्छा लगा । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं
संदीप सीतल चौहान

DR. PAWAN K MISHRA said...

aap ki kavita kavita nahi aap ka under jo chal raha hai uski abhivykti hai sunder stya rachna

DR. PAWAN K MISHRA said...

stya rachna ka liya aap ko thanks likhte rahiye etne aakroshit stya rachna kafi dino bad mili