Wednesday, January 28, 2009

ख़्वाब

मेरी मां हत्थां दे विच
बुणदी ऐ कुझ ख़्वाब
पहला ख़्वाब बुणिया सी
पुत्त नूं जमण दा
दूजा, पुत्त दे अफ़सर लगण दा
तीजा ख़्वाब बुणिया सी
पुत्त दे सेहरा बझण दा
हुण मेरी मां बुणदी ए
फिर कुझ कू ख़्वाब
उणदी ए उह ख़्वाब
दादी बनण दे
चक्कदी ए उह कुंडे
पोतरे दीयां जराबां दे
नूंह नूं दिंदी ए आशीर्वाद
रब्ब सुणु मेरी फ़रियाद
घर विच आऊ राजकुमार
मेले लगणगे
हुण मेरी मां उणदी ए
कुझ ख़्वाब

Saturday, January 17, 2009

अक्ख दा हंजू

मेरी अक्ख दा हंजू वी
करदा है मेरे नाल बातां
याद कराउंदा है मैंनू ओह
मेरीयां विसरीयां यादां
अक्ख दे हंजू चों ही मैंनू
दिसदा उसदा परछावां
इह मरजाणा भुलण न देंदा
मैं उस नूं किवें भुलावां
मैं चोहंदा हां इह सुक जावे
इह सुक जावे, इह मुक जावे
तां जो मैंनू फिर कदी वी
मेरे बीते दी याद न आवे

Monday, January 12, 2009

दिल दा सेक

मेरे जिस्म दी अगन दे अंदर
धुखदा है मेरा दिल
दिल दा महरम वाजां मारे
इक वारी आके मिल
अक्खां चो वगदे अथरू वी
लगदे ने जिऊं लावा
इक वारी आके मिल जावे
दिल दा सेक वखावां
दिल मेरा ही दिल मेरे नूं
अंदरो-अंदरी खाई जावे
पर मिलने दी आस न छडी
शायद कदी मिल जावे

Wednesday, September 24, 2008

पीड़

कोई न जाने इश्क़ की ज़ात को
न कोई पहचाने तेज़ाब की बरसात को
खिला फूल तो है सदा ही महकता
कोई न जाने सूखे पत्तों के जज़बात को
कोई न जाने दिल की पीड़ को
कोई न देखे दिल होए लीरो-लीर को
इश्क़ के सागर में लगाते हैं सारे ही डुबकी
न कोई पहचाने शिकरे यार को
कोई न जाने ग़ज़ल की बहर को
न कोई पहचाने ग़ज़ल के ज़हर को
ये हल्के-हल्के है दिल में उतरता
जो रोक देता है धड़कनों की लहर को
शिकरा- दिल का मांस खाने वाला पक्षी

Wednesday, September 17, 2008

फ़ासला




दो कू पैर पुट्टे ने ते मैं गया हां रुक
नाप रिहा हां धरती ते अंबर विचला फ़ासला
दो कू ही बुरकियां ने अजे खादीयां
नाप रिहा हां खेतां ते थाली विचला फ़ासला
भैण छोटी नूं खेडदियां लिया है चुक
नाप रिहा हां मैं खेड ते डोली विचला फ़ासला
मां ते दादी नूं मैं गल्लां करदे वेख के
नापदा हां मैं नूंह ते मां दे विचला फ़ासला
बाप दे मोडियां तों बोरी मैं लई है चुक्क
नाप रिहा हां मैं बोरी ते अरथी विचला फ़ासला

अनुवाद

दो क़दम चला हूं अभी और गया हूं रुक

नाप रहा हूं मैं धरती और अंबर के बीच का फ़ासला

दो ही निवाले अभी है खाएं

नाप रहा हूं खेत और थाली के बीच का फ़ासला

बहन छोटी को खेलते लिया है उठा

नाप रहा हूं खेल और डोली के बीच का फ़ासला

मां और दादी को बातें करते देखकर

नापता हूं मैं बहु और मां के बीच का फ़ासला

बाप के कंधों से बोरी मैंने ली है उठा

नाप रहा हूं बोरी और अर्थी के बीच का फ़ासला

Wednesday, July 23, 2008

इश्क़ ही रब्ब


लोक आखदे इश्क़ है ज़ात रब्ब दी
मैं आखदां इश्क़ ही रब्ब हुंदा

रब्ब लभदे लोक मंदरा-मसीतां विच
बिन वेखे ही रब्ब दा दीदार हुंदा

सस्सी लभिया रब्ब विच मरुथलां
हीर रांझण रब्ब लई ज़हर प्याला पीता

सोहणी महिवाल यार विच झिनाब पाया
लैला दे इश्क़ ने मजनूं मलंग कीता।

Sunday, July 20, 2008

हीर


हीर सियाली कर्मां वाली
जिस रांझण ना पाया
इक उडारी ऐसी मारी
आल्हणा खेड़ियां दे घर पाया
बिण रांझण ना जीया जावे
जा मौत नूं गले लगाया
मैं वी हां इक हीर सलेटी
जिस जोगी वर पाया
इस जोगी मैनूं कीता कमली
सारी उम्र रुलाया
अक्खीयां थक्कीयां तक-तक बूहा
पर जोगी ना आया
नां जियोंदी हां, ना मोई हां
रब्बा इह की खेड रचाया