Tuesday, June 10, 2008

ज़ौक़ की शायरी- ज़हर भरी आंख

शेख़ मुहम्मद इब्राहीम ज़ौक उस्ताद शायरों में शुमार किए जाते हैं, जिनके अनेक शागिर्दों ने अदबी दुनिया में अच्छा मुक़ाम हासिल किया है। शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ का रंग सांवला था। चेहरे पर हद से ज़्यादा चेचक के दाग़ थे। लेकिन इसके बावजूद वह बहुत अच्छे लगते थे। अकबर शाह बादशाह ने शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ को ख़ाक़ान-ए-हिन्द की उपाधि से नवाज़ा तब उनकी उम्र महज़ 19 वर्ष थी। उनकी आवाज़ ऊंची और ख़नकदार थी। मुशायरों में वे शेर पढ़कर सामईन का दिल लूट लेते थे। बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र और नवाब इलाही बख़्श ने ज़ौक़ साहब की शागिर्दी की। शेख़-ज़ौक़ एक साधारण सिपाही के पुत्र थे। उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर अनेक विघ्न-बाधाओं को रौंदते हुए, शाही दरबार में प्रवेश पाया और बहादुर शाह बादशाह के काव्य-गुरु के आसन पर प्रतिष्ठित हुए। ज़ौक़ साहब को ख़ाक़ान-ए-हिन्द जैसी महान पदवी के बाद मिलकुल शोअरा की उपाधि से भी नवाज़ा गया।

मैं आपको पढ़ाने जा रहा हूं ज़ौक़ साहब की शायरी। जिन शब्दों को इटैलिक किया है, उनका अर्थ नीचे क्रमांक दिया है।
यह अक़ामत हमें पैग़ामे-सफ़र देती है

ज़िंदगी मौत के आने की ख़बर देती है

ज़ाल दुनिया है अजब तरह की अल्लामा-ए-दहर

मर्दे-दींदार को भी दहर यह कर देती है

तैरा-बख़्ती मेरी करती है परेशां मुझको

तोमहत उस ज़ुल्फ़े-सियहफ़ाम पे धर देती है

रात भारी थी सरे-शमा पे सो हो, गुज़री

क्या तबाशीर सफ़ेदी-ए-सहर देती है

नाज़ो-अन्दाज़ तो कर चुके सब मश्क़े-सितम

मुहब्बत मेरी इस्लाह देती है

देरी शरबत है किसे ज़हर भरी आंख तेरी

ऐन एहसान है मुझसे ज़हर ज़हर भी गर देती है

क्या करें हसरते-दीदार कि दम लेने की

दिल को फ़ुरक़त नहीं वह तेग़े-नज़र देती है

शमा घबरा न तपे-ग़म से कि इक दम में अभी

आए काफ़ूर सफ़ेदी ये सहर देती है

फ़ायदा दे तेरे बीमार को क्या ख़ाक दवा

अब तो अक्सीर भी दीजे तो ज़रर देती है

ग़ुंचा हंसता तेरे आगे है जो गुस्ताख़ी से

चटखना मुंह पे वहीं बाद-सहर देती है
1 ठहराव 2 यात्रा का संदेश 3 बुढ़िया 4 संसार की बुद्धिमता 5 धार्मिक पुरुष 6 दुष्ट, नास्तिक 7 दुर्भाग्य 8 कष्ट देना 9 दोष, आरोप 10 काले केश 11 बंसलोचन 12 प्रातःकाल की उज्ज्वलता 13 अत्याचार का अभ्यास 14 सुधार 15 विशेष 16 दृष्टि की तलवार 17 दुख की गरमी 18 दूर होना, कपूर 19 अचूक दवा 20 हानि 21 अशिष्टता 22 प्रातःकाल की हवा