Friday, June 13, 2008

कविता

सूर्य उगता है तो कविता बनती है
सूर्य अस्त होता है तो कविता बनती है
फूल खिलते हैं और फिर मुरझा जाते हैं
चांद निकलता है और फिर अमावस आती है
कभी बारिश की बूंदे धरती पर पड़ती हैं
तो कभी अकाल पड़ता है
कोई महलों में रहता है
तो कोई भूख से बिलखता है
कोई परियों सी घूमती है
कोई तन ढकने के लिए कपड़े को तरसती है
दुनिया की हर शय में कविता है
हर शय ख़ाक हो जाती है
नहीं मरती तो सिर्फ़ कविता