Sunday, May 18, 2008

आवाज़

इक ऐसी आवाज़
जो सदियों से मुझे सुनाई देती है
इक ऐसी आवाज़
जो कभी मुझे मेरी मां की आवाज़ लगती है
इक ऐसी आवाज़
जो कभी मुझे मेरी बहन की आवाज़ लगती है
इक ऐसी आवाज़
जो कभी मुझे मेरी परेमिका की आवाज़ लगती है
इक ऐसी आवाज़
जो कभी मुझे खेल रही बच्ची की आवाज़ लगती है
इक ऐसी आवाज़
जो कभी मुझे भीख मांग रही बच्ची की आवाज़ लगती है
इक ऐसी आवाज़
जो कभी मुझे ससुराल जाती लड़की की आवाज़ लगती है
इक ऐसी आवाज़
जो कभी मुझे चीखती-कराहती लड़की की आवाज़ लगती है
कभी इन आवाज़ों से मैं पीछा छुड़ाना चाहता हूं
और कभी इनकी तरफ खिंचा चला जाता हूं
पता नहीं क्यों सुनाई देती हैं मुझे ये आवाज़ें?

1 comment:

Amit K. Sagar said...

आवाज अच्छी रचना, चूँकि इक़ कवी को चरम पर उसे कुछ न हासिल हो ही जाता है...ये नहीं मिला...!बारीकियां आप भूले से लगते हैं. आत्मिक संबंधों की आवाजों को माना की घटनाएं अहम् बना देती हैं...पर मानव की अपनी प्रकृति-प्रवृति इनकी भी मोहताज नहीं होती....अपेक्षा इसकी कि {कभी इन आवाज़ों से मैं पीछा छुड़ाना चाहता हूं
और कभी इनकी तरफ खिंचा चला जाता हूं} प्रभावशाली.
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आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं. इस प्रयास को जारी रखें...आप और भी अच्छा लिखें, येसी शुभकामनायें.
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उल्तातीर- तीर वही जो घायल कर दे ~!~http://ultateer.blogspot.com